Monday, 7 September 2015

हिंदी के मुहावरे,बड़े ही बावरे है,

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हिंदी के मुहावरे,बड़े ही बावरे है,


खाने पीने की चीजों से भरे है....
कहीं पर फल है तो कहीं आटा दाले है ,
कहीं पर मिठाई हैकहीं पर मसाले है ,
फलों की ही बात ले लो....
आम के आमगुठलियों के भी दाम िलते है,
कभी अंगूर खट्टे हैं,
कभी खरबूजे,
खरबूजे को देख कर रंग बदलते है,
कहीं दाल में काला है,
कोई डेड़ चावल की खिचड़ी पकाता है,
कहीं किसी की दाल नहीं गलती,
कोई लोहे के चने चबाता है,
कोई घर बैठा रोटियां तोड़ता है,
कोई दाल भात में मूसरचंद बन जाता हैमुफलिसी में जब आटा गीला होता है ,
तो आटे दाल का भाव मालूम पड़ जाता है.
सफलता के लिए   बेलने पड़ते है  पापड़,
आटे में नमक तो जाता है चलपर गेंहू के साथघुन भी पिस जाता है 
अपना हाल तो बेहाल हैये मुंह और मसूर की दाल है
गुड खाते हैं और गुलगुले से परहेज करते हैं,
और गुड़ का गोबर कर बैठते हैं
कभी तिल का ताड़कभी राई का पर्वत बनता है,
कभी ऊँट के मुंह में जीरा है ,
कभी कोई जले पर नमक छिड़कता है,
किसी के दांत दूध के हैं ,
किसी को छटी का दूध याद  जाता है ,
दूध का जला छाछ को भी फूंक फूंक पीता है ,
और दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है 
शादी बूरे के लड्डू हैं , जिसने खाए वो भी पछताए,
और जिसने नहीं खाएवो भी पछताते हैं 
पर शादी की बात सुनमन में लड्डू फूटते है ,
और शादी के बाददोनों हाथों मे लड्डू आते हैं 
कोई जलेबी की तरह सीधा हैकोई टेढ़ी खीर है,
किसी के मुंह में घी शक्कर हैसबकी अपनी अपनी तकदीर है...
कभी कोई चाय पानी करवाता है,
कोई मख्खन लगाता है
और जब छप्पर फाड़ कर कुछ मिलता  ,
तो सभी के मुंह में पानी आता है 
भाई साहब अब कुछ भी हो ,
घी तो खिचड़ी में ही जाता है,
जितने मुंह हैउतनी बातें हैं, 
सब अपनी अपनी बीन बजाते है,
पर नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है ,
सभी बहरे हैबावरें है

ये सब हिंदी के मुहावरें हैं ...


सभी बहरे हैबावरें है

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