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Tuesday, 24 December 2013

गुरु नानक जी

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गुरु नानक जी के पास एक
आदमी गया जिसका नाम भुमिया था | वह
था तो चोर पर साधू संतो के प्रति उसके मन में
आस्था थी | नानक जी ने पूछा कि तुम
क्या करते हो ? वह बोला चोरी करता हूँ | गुरु
जी ने कहा कि चोरी तो बुरी होती है छोड़ दो | गुरु
जी माफ़ी दें मैं चोरी नहीं छोडूंगा | नानक जी ने
कहा कि अच्छा तुम मेरी दो तीन बात मानोगे |
उसने कहा कहिए | वे बोले कभी झूट
नहीं बोलना | जिसके नमक खाना उसके साथ
दगा मत करना और गरीबों की आह मत लेना |
उसने गुरु जी की बातों को मान लिया | पहले
तो वह किसी के भी घर जाकर चोरी कर
लेता था | पर अब वो सोचने लगा कि किसके घर
जाऊं आखिर में एक सेठ के घर चोरी करने गया |
जैसे ही दीवार पार कर अन्दर प्रवेश
किया कि दरबान सजग हो गए और पूछा कौन
हो ? वह बोला - मैं चोर हूँ | गुरु जी के बातें उसके
दिल दिमाग में घूमती रहती थी | दरबान ने
सोचा कि भला कोई चोर यह कहेगा कि मैं चोर हूँ |
यह जरुर कोई सेठ का पहचान वाला या रिश्तेदार
होगा उन्होंने उसे नहीं रोका | वह अन्दर घुस
गया और सारा सामान बांधकर इकट्ठा किया |
जब वह चलने को हुआ तो देखा कि एक
डब्बा पड़ा है उसने उसे खोला तो उसमें चूरण
था | उसने थोडा सा चखा उसे अच्छा लगा उसने
और खा लिया | चूरण में नमक था वह सामान
उठाने वाला ही था कि उसे गुरु जी कि बात याद
हो आई कि जिसका नमक खा लिया उसके साथ
कभी गद्दारी मत करना | वह सामान छोड़कर
चला गया | दुसरे दिन सेठ ने देखा कि सामान
बंधा है उसने दरबानो से
पूछा कि मामला क्या है ? उन्होंने सब
बता दिया | यह कहा कि मैंने उसकी शक्ल
नहीं देखी कि वह कैसा था | सेठ ने गरीब
नौकरों को डर दिखाना शुरू किया पर वे बिचारे
तो बेगुनाह थे उन्हें कुछ भी मालूम नहीं था जब
भुमिया ने सुना तो वह सेठ के पास आया और
सारी बातें सच सच बता दी | सेठ ने पूछा कि यह
बता कि तुझे ये सीख दी किसने ? वह बोला एक
संत नानक देव आए हुए हैं उनसे ही मैंने यह सीख
ली | सेठ नानक जी से बड़ा प्रभावित हुआ |
उसने जाकर उनके दर्शन किए और उनका भक्त
बन गया |
स्वामी जी महाराज भी कहा करते हैं कि तुम
बदल जाओ तुमको देखकर लोग खुद व खुद चले
आएंगे | दूसरे महात्माओं की बात दिल दिमाग
को धक्का मारती रहती है | बड़े बड़े चोर डाकू
उनके पास जाकर सुधर जाते हैं और भक्त बन
जाते हैं | चाहे जितना पूजा पाठ करो अगर झूट
बोलते हो तो तुम्हारी कोई पूजा कबूल
नहीं करता है भगवान |

                                          ( hari krishnamurthy K. HARIHARAN)"
'' When people hurt you Over and Over
think of them as Sand paper.
They Scratch & hurt you,
but in the end you are polished and they are finished. ''

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